व्यवसाय तथा ग्रह

व्यवसायों के प्रकार का निर्णय ग्रहों को स्वरूप, बल आदि पर निर्भर करता है। जो ग्रह अत्यधिक बलवान् होकर लग्न, लग्नेश आदि आजीविका के द्योतक अंगों पर प्रभाव डालता है वह ग्रह आजीविका  के स्वरूप अथवा प्रकार को जतलाने वाला होता है। अत: ग्रहों के स्वरूप का ज्ञान आजीविका के निर्णय करने के लिये अत्यावश्यक है। इसी तथ्य को दृष्टि में रखते हुए ग्रहों के स्वरूप का कुछ विवेचन नीचे किया जाता है।

सूर्य- सूर्य सब ग्रहों में ऊँचा बड़ा, मुख्य व राजा है। इसलिये जब यह ग्रह धन्धों को दर्शाता है तो वह धन्धा ऊँचे दरजे का, विस्तृत क्षेत्र में व्यापक, बहुत प्रदेशों से सम्बन्धित, बहुत पूँजी वाला होता है। सूर्य का राज्य से घनिष्ठï सम्बन्ध है, क्योंकि सूर्य स्वयं राजा, राजपुरुष है। अज: जब सूर्य धन्धे का निर्णायक हो तो उस धन्धे का सम्बन्ध राज्य से किसी न किसी प्रकार का होता है। यदि सूर्य बहुत बलवान हो तो मनुष्य को साधारण राज्य कर्मचारी बना देता है। यदि सूर्य का लग्र, लग्रेश, राशीश आदि से अन्य ग्रहों की अपेक्षा अधिक सम्बन्ध हो अर्थात अपनी युति अथवा दृष्टि द्वारा सूर्य इन लग्रादि पर प्रभाव डाल रहा हो तो सूर्य धन्धे की दिशा को जतलाता है। यदि द्वितीयेश, पंचमेश, नवमेश, दशमेश, एकादशेश हो कर बलवान हो तो मनुष्य को दूसरों पर शासन करने वाला राजा, गवर्नर, मन्त्री, प्रेजिडेन्ट, नवाब आदि उच्च पदवी वाला शासक बना देता है।

सूर्य अग्रिरूप है। जब यह मंगल और केतु के साथ मिलकर कार्य करता है तो अग्रि-सम्बन्धित कार्य जैसे बिजली का कार्य, बिजली के सामान का कार्य, तोप-बन्दूक का कार्य, रेडियो से सबन्धित कार्य करवाता है। चूँकि सूर्य पिता है और नवम स्थान पिता का है तथा पंचम भाव का भी नवम से नवम होने के कारण पिता से सम्बन्ध है अत: यदि धन्धा-द्योतक ग्रह पर सूर्य, नवमेश तथा पंचमेश तथा इन भावों का समबन्ध हो तो मनुष्य पिता के साथ मिलकर कारोबार करता है। उसी पर निर्भर रहता है स्वतन्त्र कार्य नहीं करता।

सूर्य को वैद्य भी माना गया है। जब अन्य ‘वैद्य’-द्योतक ग्रहों का प्रभाव तथा सूर्य का प्रभाव मिलकर धन्धा-द्योतक ग्रह पर पड़ता है तो वे मनुष्य को डाक्टर अथवा वैद्य बना देते हैं। अन्य ‘वैद्यक’-द्योतक ग्रह हैं-शनि तथा राहु।

सूर्य एक सात्विक ग्रह है जब यह  गुरु, नवमेश आदि धार्मिक ग्रहों को साथ लेकर ‘धन्धा’-द्योतक ग्रहों पर प्रभाव करता है तो मनुष्य धर्म से धन कमाता है अथात् किसी मन्रि के पुजारी के रूप में, किसी मठ के अधीश के रूप में, किसी  संस्था के पुरोहित के रूप में उसको धन, वेतन, दान की प्राप्ति होती है। इस सन्दर्भ में द्वादश स्थान ‘धर्म मन्दिर’ का द्योतक है। क्योंकि द्वादश स्थान नवम से चतुर्थ है अर्थात धर्म अथवा ‘देव’ का घर अथवा स्थान है। सूर्य लकड़ी का कारक भी है। जब सूर्य चतुर्थेश होकर अथवा चतुर्थेश से समबन्ध रखता हुआ धन्धे का द्योतक हो तो लकड़ी से सम्बन्धित कार्य को देता है जैसे इमारती लकड़ी बेचने वाला अथवा फरनीचर बेचने वाला बनाता है, क्योंकि चतुर्थेश, घर के निर्माता तथा घर की सुविधओं आदि से धनिष्ठï संबन्ध रखता है।

चन्द्र- ग्रहों में चन्द्र ‘जलीय’ है। शुक्र भी जलीय ग्रह है। चतुर्थेश, अष्टïमेश तथा द्वादशेश भी ‘जलीय’ प्रभाव रखते हैं। अत: यदि चन्द्र का दूसरे ‘जलीय’ अंगों का ‘धन्धा-द्योतक’ ग्रह पर प्रभाव हो तो मनुष्य ‘जलीय’ कार्यों द्वारा धनोपार्जन करता है। जैसे जलसेना में कार्य करना, सोडा वाटर फैक्टरी में कार्य करना, रंग निर्माण आदि कार्य करना, शर्बत बेचना, नाव चलाना, पानी के वितरण विभाग में काम करना आदि।

चन्द्र का खाने-पीने से घनिष्ठï सम्बन्ध है, क्योंकि चन्द्र लग्र भी है और जलीय ग्रह भी; अत: जब चन्द्र का तथा द्वितीयेश का प्रभाव धन्धा-द्योतक ग्रह पर पड़ता  है तो मनुष्य खने-पीने के कार्य जैसे होटल आदि का कार्य, दूध आदि खाद्य पदार्थों की विक्री का कार्य करता है।

चन्द्र जब धन्धे से संबन्ध रखता हो और उस पर राहु का प्रभाव हो तो मनुष्य शराब बेचने का कार्य करता है, क्योंकि ‘शराब’ विष-संपृक्त जलीय पदार्थ का ही रूपान्तर मात्र है और राहु विष तथा मलिनता का द्योतक है।

चन्द्र एक ‘स्त्री’ ग्रह है जब यह ग्रह दूसरे स्त्री ग्रहों शुक्र, बुध, शनि आदि को लेकर ‘धन्धे’ का परिचायक होता है तो मनुष्य को स्त्रियों के साथ मिलकर धन्धा करने का अवसर प्राप्त होता है, जैसा कि फिल्म लाइन में अभिनेता होना। राजकपूर, अशोककुमार आदि फिल्म-अभिनेताओं की कुण्डलियों में यह योग देखने को मिलता है। यदि स्त्री ग्रह नीच स्थिति में हों तथा राहु आदि मलिन प्रभाव में हों तथा ‘जनता’ से सम्बन्ध रखता हो तो व्यभिचार से धन कमाता है।

चूंकि चन्द्र रानी है अत: राज्य से भी इसका घनिष्ठï सम्बन्ध है। अत: जब यह ग्रह राज्य-द्योतक सूर्य, बृहस्पति आदि ग्रहों से मिल कर धन्धे का द्योतक होता है तो राज्य-सम्बन्धी कार्य जैसे शासन कार्य, राज्य अधिकारी कार्य, राज्य अधिकारी कार्य, राज्य कर्मचारी करवाता है।

चन्द्रमा मन का कारक है। यदि यह ग्रह, चतुर्थ भाव का स्वामी, सभी शनि तथा राहु की द्दष्टिï आदि जनित प्रभाव में हों तो मनुष्य का मन मन्दगामी, उदासीन, वितक्त हो जाता है। जिसके फलस्वरूप वह मनुष्य कोई भी कार्य अथवा धन्धा नहीं करता। साधुओं फकीरों अथवा सम्पत्ति जीवी मनुष्यों की कुण्डली में ऐसा योग बैठता है।

चन्द्र सुगन्धिप्रिय ग्रह है। अत: जब यह ‘शुक्र’ के साथ मिलकर ‘धन्धे’ का द्योतक होता है तो सुगन्धित तेलों तथा सेन्टों का काम धन्धा कराने वाला होता है। क्योंकि शुक्र भी सुगन्धि तथा भोगप्रिय ग्रह है।

 चन्द्र जब द्वितीयाधिपति होकर धन्धे का द्योतक होता है और बुध आदि व्यापारी ग्रहों से सम्बन्ध करता हुआ धन्धे को दर्शाता है तो चावल आदि जल से उत्पन्न होने वाले अथवा जल से घनिष्ठ संबन्ध रखने वाले खाद्य पदार्थों, जैसे चावल आदि, द्वारा धन कमाता है।

चन्द्र जब किसी लग्र का स्वामी हो तथा द्वितीयाधिपति गुरु से प्रभावित होकर ‘धन्धे’ का द्योतक हो तो मिष्टान्न के काम से धन से पाता है।

मंगल- मंगल र्अिग्रमय है। यह ग्रह जब धन्धे का स्वयं अथवा केतु, सूर्य आदि अन्य अग्रिद्योतक ग्रहों को साथ लेकर धन्धे का द्योतक होता है तो अग्रि संबन्धित कार्यों द्वारा धनोपार्जन करवाता है जैसे भट्टी के काम, बिजली के सामान का काम, खाद्य सामग्री पकाने का काम और फैक्टरी का काम करवाता है। मंगल साहस तथा हिसाप्रिय है। जान-जोखों के कार्य इसे बहुत प्रिय हैं अत: मिलिटरी अथवा रक्षा विभाग से इस का घनिष्ठï सम्बन्ध है। जब यह धन्धे का द्योतक होता है तो मनुष्य रक्ष विभाग में आफिसर अथवा कर्मचारी अथवा उस विभाग से संबन्धित कार्य करने वाला होता है।

मंगल भूमिपुत्र कहलाता है अर्थात् इस प्रह का भूमि, मकान आदि से घनिष्ठï संबन्ध है। अत: जब यह चतुर्थेश होकर अथवा चतुर्थेश से मिलकर धन्धे का द्योतक होता है तो भूमि की आय, किराया आदि द्वारा धन दिलाता है।

यदि मन पर भी मङ्गïल का अधिक प्रभाव हो जैसे लग्र में मंगल की स्थिति अथवा लग्रेश चतुर्थेश पर मंगल की द्दष्टिï हो और साथ ही साथ मंगल काम धन्धे का द्योतक ग्रह भी बनता हो तो मनुष्य डकैती आदि क्रूर कार्यों से धन पाता है, विशेषतया तब जब कि एकादिश भाव पर भी मंगल का प्रभाव हो।

मंगल पुरुषार्थ प्रिय, क्रिया प्रिय, कर्मठ ग्रह है अत: जब यह काम धन्धे का द्योतक होता है तो मनुष्य में प्रबन्ध की योग्यता आ जाती है और वह दूसरों से कार्य लेने में समर्थ रहता है।

मंगल हेतुप्रिय ग्रह है। यह मनुष्य में बुद्घि को तथा ऊहापोह शक्ति को बढ़ाता है अत: जब यह ग्रह बुद्घि स्थान का स्वामी होकर बलवान्ï तथा धन्धे का द्योतक होता है तो मनुष्य को शासक तथा मन्त्री बना देता है। देखा गया है कि मंगल की पंचम भाव पर दृष्टिï मनुष्य को तीव्र बुद्घि वाला बनाती है।

मंगल एक क्षत्रिय ग्रह है। सूर्य भी क्षत्रिय ग्रह है। जब सूर्य से प्रभावित मंगल ‘धन्धे’ का परिचायक होता है तो मनुष्य को राज्य के क्षात्र विभाग में कार्य करवाता है विशेष्तया जबकि तृतीयेश तथा द्वादशेश भी इस योग में सम्मिलित हों।

मंगल को चोरी की भी आदत है। जब यह ग्रह ‘चोर’ स्थान का स्वामी हो, अथवा छठे से छठे अर्थात् ग्यारहवें भाव का स्वामी हो तो इस में ‘चोरी’ का भाव आ जाता है। यदि ऐसा मंगल शुभ प्रभाव से हीन होकर ‘धन्धे’ का द्योतक हो तो मनुष्य चोरी आदि के धन्धे से धन प्राप्त करता है।

मंगल यदि चन्द्र तथा शुक्र से प्रभावित होता हुआ तथा चतुर्थेश होता हुआ ‘धन्धे का द्योतक हो तो मनुष्य घर, द्वारा धन कमाता है। चन्द्र जनता है, शुक्र इकठ्ठा करता है, तथा मंगल’ भूमि से तथा जायदाद से लाभ का प्रतीक है।

बुध- बुध ‘बुद्घि’ का ग्रह है। यदि यह ग्रह द्वितीय, पंचम, नवम आदि बुद्घि स्थानों का स्वामी होता हुआ ‘धन्धे’ का द्योतक हो अर्थात्ï लग्र लग्रेश, चन्द्र चन्द्रेश,  सूर्य सूर्येश को अधिकतम प्रभावित करता हो तो मनुष्य बुद्घिजीवी होता है। अर्थात्ï स्कूल मास्टर, प्रोफेसर, अध्यापक आदि होकर धनोपार्जन करता है।

बुध ‘भाषण’ अथवा ‘वाणी’ का कारक ग्रह है; अत: यदि यह ग्रह द्वितीयेश, पंचमेश होता हुआ गुरु के साथ धन्धे का द्योतक हो तो मनुष्य भाषणों द्वारा धनोपार्जन करता है, जैसे कि वकील करते हैं।

बुध व्यापार का ग्रह है। यदि यह ग्रह शनि, शुक्र आदि व्यापार द्योतक ग्रहों को साथ लेकर ‘धन्धे’ का द्योतक ग्रह बनता हो तो मनुष्य व्यापारी होता है। बुध के बलवान होने के दशा में वह कपड़े का व्यापार करता है, क्योंकि बुध का कपड़े से घनिष्ठï सम्बन्ध है।

बुध ‘लेखक’ है, जब वह धन्धे का द्योतक होता है और ‘राज्य’ द्योतक ग्रहों, सूर्य आदि से भी प्रभावित होता है तो मनुष्य राज्य के किसी विभाग में लिखने का कार्य करने वाला जैसे क्लर्क अथवा स्टेनो का कार्य करता है। यदि बहुत बलवान्ï हो तो लेखा आफिसर बना देता है।

यदि बुध मंगल के साथ बली हो और धन्धे का द्योतक हो तो हिसाब किताब का व्याख्याता बना देता है।

बुध यदि तृतीयाधिपति हो और बलवान्ï होकर ‘धन्धे’ का द्योतक हो अर्थात्ï लग्र लग्रेश आदि लग्रों पर अपना प्रभाव अन्य ग्रहों  की अपेक्षा अधिक डाल रहा हो तो मनुष्य अपने लेखों द्वारा आजीविका का उपार्जन करता है, क्योंकि बुध लेखक है और तृतीय स्थान भी हाथ होने से लिखने ही को दर्शाता है।

बुध विनोदप्रिय है अत: जब यह ग्रह अन्य विनोदप्रिय ग्रहों तथा अंगों, जैसे चतुर्थेश, पञ्चेश तथा शुक्र से सम्बन्ध करता हुआ धन्धे का द्योतक होता है तो विनोद द्वारा अर्थात्ï सिनेमा मोदसभा आदि आमोद प्रमोद के स्थानों से आजीविका को प्राप्त करता है।

बुध गुमाश्ता है। यदि यह चतुर्थेश से सम्बन्ध रखता हो और मंगल से भी प्रभावित हो तो जायजाद का एजेन्ट होता है।

बृहस्पति- यह ग्रह कानून से घष्ठिï सम्बन्ध रखता है। अत: यदि ये अष्टïमेश, एकादेशेश तथा बलवान होकर बुध को साथ लेकर अथवा शुक्र को साथ लेकर ‘धन्धे’ का द्योतक हो अर्थात्ï लग्र लग्रेश आदि लग्रों पर अपना प्रभाव डालता हो तो मनुष्य को वकील, एडवोकेट इनकमटैक्स का वकील बनाता है। उपरोक्त गुरु पर यदि मंगल का प्रभाव हो तो फौजदारी का वकील होता है। अधिक बलवान् होने पर यही बृहस्पति व्यक्ति को न्यायाधीश भी बना देता है। अष्टम तथा एकादश स्थान राज्य की आय हैं।

बुध की भाँति बृहस्पति भी भाषण से घनिष्ठï सम्बन्ध रखता है। अत: जब वाणि द्योतक घरों द्वितीय तथ पञ्चम का स्वामी होता हुआ बुध को साथ लेकर ‘धन्धे’ का द्योतक होता है तो मनुष्य भाषण द्वारा आजीविका प्राप्त करता है जैसे कि वकील तथा अध्यापक लोग करते हैं।

बृहस्पति का जब नवमेश, द्वादशेश व पञ्चमेश से सम्बन्ध होता है और पुन: वह बृहस्पति धन्धे का परिचायक  हो तो मनुष्य धर्मशाला, मन्दिर देवस्थान आदि द्वारा पुरोहित पुजारी आदि के रूप से धन प्राप्त करता है। ऐसे योग में लग्र लग्रेश आदि पर बृहस्पति तथा शुक्र, का प्रभाव होने से मनुष्य का जन्म भी ब्राह्मïण कुल में होता है (बृहस्पति तथा शुक्र ब्राह्मïण ग्रह हैं)।

बृहस्पति ‘धन का कारक ग्रह है। जब यह ग्रह द्वितीय तथा एकादश भवों का स्वामी हो और लग्र लग्रेश आदि लग्रों पर अधिकतम प्रभव डालने के कारण ‘धन्धे’ का द्योतक ग्रह भी हो तो यह ‘गतिशील’ धन से, सूद ब्याज से, कैश सर्टिफिकेट्ïस, किराया आदि से या बैंक की नौकरी से धनोपार्जन कराता है।

बृहस्पति बलवान्ï हो और एकादशाधिपति हो तो बड़े भाई का पक्का प्रतिनिधि होता है। ऐसा बृहस्पति यदि लग्र, लग्रेश आदि पर अधिकतम प्रभाव डालने के कारण धन्धे का द्योतक हो तो ऐसा व्यक्ति बड़े भाई द्वारा अथवा उससे मिलकर धनोपार्जन करता है और उसे बड़े भाई से बहुत सहायता मिलती है।

बृहस्पति को ‘राज्यकृपा कारक’ माना गया है और नवम स्थान राज्यकृपा का है। यदि बृहस्पति नवमेश होकर बलवान हो और लग्र, लग्रेश आदि पर अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव डालने के कारण ‘धन्धे’ का द्योतक भी हो तो मनुष्य को दैवयोग से राज्य की प्राप्ति होती है और उससे धन मिलता है अथवा किसी महान्ï राज्याधिकार द्वारा आजीविका प्राप्त होती है।

शुक्र- गुरु की भाँति शुक्र भी कानून से सम्बन्ध रखता है क्योंकि यह भी दैत्याचार्य है।  जब गुरु के साथ मिलकर यह ग्रह लग्र, लग्रेश आदि लग्रों पर अपेक्षाकृत अधिकतम प्रभाव डालता है तो व्यक्ति को कानून से संबन्धित काम धन्धों में लगाता है; जैसे वकालत,  सेल्स टैक्स  इन्स्पेक्टर इन्कम टैक्स प्रेक्टीशनर आदि।

शुक्र स्त्री ग्रह है। जब यह ग्रह चन्द्र बुध शनि आदि  स्त्री ग्रहों को साथ लेकर ‘धन्धे’ का द्योतक  उपरोक्त रीति से होता है तो स्त्रियों के सम्पर्क से अथवा उनके द्वारा धनोपार्जन कराता है जैसा कि फिल्मलाइन के अभिनेता, डाइरेक्टर आदि करते है।

शुक्र जलीय ग्रह है। चन्द्र के साथ अथवा जलीय भाव के स्वामियों के साथ मिलकर जब यह ग्रह उपरोक्त रीति से ‘धन्धे’ का द्योतक होता है तो मनुष्य  जलीय कार्यों से धनोपार्जन करता है जैसे, जलसेना में भरती होकर, सोडावाटर फैक्टरी चला कर, तेल अथवा शरबत आदि तरल पदार्थ बेचकर, रंग बेच कर, पानी सप्लाई के विभाग में नौकरी द्वारा तथा अन्य जलीय कार्यों द्वारा धनोपार्जन करता है।

शुक्र एक सौन्दर्यप्रिय ग्रह है। सुन्दरता तथा भोगविलास से सम्बन्ध रखने वाले जितने धन्धे हैं सब का सम्बन्ध शुक्र से है जैसे, मुख तथा शरीर के सौन्दर्य का वर्धन करने वाले पदार्थ, बढिय़ा तेल, इतर सुगन्धित वस्तुएँ आदि। अत: जब शुक्र बुध आदि ‘व्यापारी’ ग्रहों को साथ लेकर ‘धन्धे’ का परिचायक होता है तो व्यक्ति को फैंसी गुड्ïस का विक्रेता आदि बना देता है।

शुक्र गाना बजाना बहुत चाहता है। जब भाषण भावों (द्वितीय तथा पञ्चम) तथा वाद्यकारक बुध से संबन्ध करता हुआ शुक्र ‘धन्धे’ का द्योतक हो तो व्यक्ति गाने बजाने द्वारा आजीविका का उपार्जन करने वाला होता है।

शुक्र ‘वाहन’ का भी कारक है। यदि वाहन स्थान से सम्बन्ध। रखता हुआ अथवा वाहनेश (चतुर्थेश) से संबन्ध रखता हुआ शुक्र है अर्थात्ï वह गाड़ीवान, पाइलट आदि होता है। यदि वायुस्थानीय ग्रहों का प्रभाव सम्मिलित हो तो वायुयान का चालक होता है अन्यथा, दूसरे मोटर आदि यान का चालक होकर आजीविका का उपार्जन करता है।

शुक्र जब चतुर्थ भाव अथवा चतुर्थेश अथवा चन्द्र पर प्रभाव डालता है और चन्द्र पर शनि का प्रभाव भी होता है तो मनुष्य में कविता करने की शक्ति उत्पन्न होती है। ऐसा शुक्र यदि ‘धन्धे’ का द्योतक हो तो मनुष्य हो कविताओं आदि से धन की प्राप्ति होती है।

शुक्र जब सप्तमाधिपति हो तो ‘रत्न’ प्राप्त होता है, यदि ऐसा शुक्र शुभ, लग्राधिपति धनाधिपति, अथवा गुरु से प्रभावित होता हुआ धन्धे का द्योतक हो तो मनुष्य सर्राफ होता है। और रत्नों का व्यापार करता है।

तृतीयाधिपति शुक्र चन्द्र से प्रभावित होता हुआ यदि ‘धन्धे’ का द्योतक हो तो ‘फल’ का व्यापार करने वाला होता है। शुक्र फल है। चन्द्र खाद्य पदार्थ है, दोनों रसमय हैं।

शनि- शनि पत्थर माना गया है। यदि इस ग्रह का सप्तम भाव से घनिष्ठï सम्बन्ध हो तो यह ग्रह ‘पत्थर’ का प्रतिनिधि हो जाता है। यदि ऐसे शनि का प्रभाव लग्र, लग्रेश आदि लग्रों पर हो तो मनुष्य सडक़ आदि बनवाले तथा पत्थर सप्लाई करने आदि पत्थर के कामों द्वारा जीवन यापन करता है। अथवा पी डब्ल्यू डी में कार्य करता है। दशमेश शनि भी पत्थर का द्योतक है, क्योंकि दशम उच्च स्थान है। यदि दशमेश शनि धन्धे का द्योतक हो तो भी पत्थर का काम सीमेन्ट आदि का काम करने वाला होता है।

शनि का भूमि क्षेत्र से विशेष सम्बन्ध है, बल्कि इस का शनि कारक हे अत: जब शनि चतुर्थेश अथवा योगकारक होता हुआ बलवान हो और ‘धन्धे’ का द्योतक हो तो मनुष्य को बुहत भूमि की प्राप्ति होती है।

शनि अधोमुखी ग्रह है अत: पृथ्वी के भीतर रहने वाले पदार्थों लोहा, कोयला, पेट्रोल, भूमि, तेल का कारक है। जब शनि चतुर्थेश होकर धन्धे का परिचायक होता है तो इन पदार्थों से धन का लाभ देता है।

शनि मृत्यु से घनिष्ठï सम्बन्ध रखता है, अत: मृत शरीरों से प्राप्त होने वाला चमड़ा शनि द्वारा प्रदिष्टï होता है। जब शनि अष्टïमाधिपति अथवा तृतीयाधिपति होता हुआ ‘धन्धे’ का द्योतक होता है तो चमड़ा, जुते आदि द्वारा आजीविका देता है।

शनि भूमि क्षेत्र का कारक है अत: जब  चतुर्थेश होकर धन्धे का द्योतक होता है तो मनुष्य को कृषि द्वारा धन देता है।

शनि रोग से सम्बन्धित है अत: डाक्टर अथवा वैद्य भी है। अत: जब यह ग्रह सूर्य, राहु आदि अन्य ‘वैद्य’ ग्रहों के प्रभाव को लेकर ‘धन्धे’ का द्योतक होता है तो मनुष्य चिकित्सक होता है यदि विद्या का पर्याप्त योग हो तो।

शनि यदि बलवान न हो तो निम्र प्रकार के नौकरी आदि परतन्त्रता के कार्य देता है।

शनि बलवान हो और विद्या पर्याप्त हो, तथा शनि मङ्गïल से प्रभावित हो और ऐसा शनि यदि धन्धे का द्योतक हो तो यन्त्र आदि का कार्य करने वाला इन्जीनियर होता है जिसका बिजली से सम्बन्ध होता है। यदि शनि का मंगल से सम्बन्ध न हो बुध से हो तो मैकेनिकल इंजीनियर होता है।

शनि लोहा है जब यह तृतीयेश चतुर्थेश हो तो वाहन की लोह पटड़ी होता है अत: रेलवे का प्रतिनिधि होता है, यदि ऐसा शनि ‘धन्धे’ का द्योतक हो तो रेल विभाग में कार्य करने वाला अथवा इंजिन ड्राइवर होता है।

शनि पत्थर है। यदि सप्तमेश होता हुआ तथा शुक्र से बहुत प्रभावित होता हुआ ‘धन्धे’ का द्योतक हो तो मनुष्य को पत्थर की मूर्तियों के काम से धनोपार्जन करवाता है।

Acharya Anupam Jolly

आचार्य अनुपम जौली, यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है और अब आचार्य जी ने रमल शास्त्र पर अपनी कुछ अत्यंत विशिष्ट खोज करके यह साबित कर दिया कि कालांतर में विलुप्त हो चुकी हमारी अद्भुत एवं दिव्य ज्ञानवर्धक विद्यायें हमारे लिए बेहद लाभदायक थीं। जिन्हें अल्पज्ञान के चलते आप और हम नजऱ अन्दाज कर बैठे हैं।

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