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ज्योतिष में तिथि

अर्थववेदीय ज्योतिष में मुहूर्त निर्धारण में तिथियों को भी विशेष स्थान दिया गया है। तिथि, करण, गोचर का चन्द्रमा तथा मुहूर्तों के शुभ-अशुभ संयोग के आधार पर ही किसी कार्य को करने अथवा न करने का निर्णय किया जाता है। अभी तक हमने मुहूर्त तथा करण के बारे में पढ़ा है। इस अध्याय में हम तिथियों के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे।

तिथियों को मुख्य रूप से पांच भागों क्रमशः नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता तथा पूर्णा में विभक्त किया गया है। प्रतिपदा, षष्ठी तथा एकादशी को नन्दा तिथी कहा जाता है। द्वितीया, सप्तमी तथा द्वादशी को भद्रा तिथि की संज्ञा दी गई है। तृतीया, अष्टमी तथा त्रयोदशी को जया तिथि कहा जाता है। चतुर्थी, नवमी तथा चतुर्दशी को रिक्ता तिथि कहा जाता है। पंचमी, दशमी तथा पूर्णमासी को पूर्णा तिथि कहा जाता है।

अर्थववेद के अनुसार नन्दा तिथियों में नवीन वस्त्रा धारण तथा आभूषण पहनने को प्रशस्त बताया गया है। नन्दा तिथियों पर आनन्द मनाने की भी आज्ञा दी गई है। भद्रा तिथियों में शुभ व मांगलिक कार्य, प्रीतिभोज तथा पद ग्रहण संबंधी कार्य करना अनुकूल रहता है। जय तिथियों को व्यापारियों तथा सैन्य कार्यों हेतु विशेष अनुकूल माना गया है। जया तिथियों में आक्रमण, शस्त्र-निर्माण, मुकदमा दायर करना, सामान का क्रय-विक्रय करने पर अवश्य ही सफलता मिलती है। रिक्ता तिथियों पर चर या स्थिर किसी भी प्रकार के कार्य नहीं करने चाहिए। परन्तु यदि रिक्ता तिथि शनिवार को आती है तो उस दिन आरंभ किए गए समस्त कार्यों में अवश्य ही सफलता मिलती है। पूर्णा तिथियों को नवीन निर्माण, वाहनादि क्रय, नवीन योजनाओं का आरंभ, नवीन गृह या भवन का शिलान्यास जैसे समस्त कार्य करना प्रशस्त बताया गया है।

तिथि तथा वार

ज्योतिष में कहा गया है, नन्दा तिथि शुक्रवार को, भद्रा तिथि बुधवार को, जया तिथि मंगलवार को, रिक्ता तिथि शनिवार को अथवा पूर्णा तिथि गुरुवार को आए तो ऐसा संयोग में आरंभ किए गए समस्त कार्यों में सफलता अवश्य मिलती है। उन्हें सिद्धी योग भी कहा जाता है। इनके अतिरिक्त यदि तृतीया तिथि मंगलवार को आए तो अत्यन्त शुभदायी होती है।

युग्म तिथियाँ यथा द्वितीया, चतुर्थी, षष्ठी, अष्टमी, दशमी, द्वादशी तथा चतुर्दशी तिथियों को दोषयुक्त कहा गया है। चतुर्थी, षष्ठी, अष्टमी, नवमी तथा चतुर्दशी तिथियों को छिद्र तिथि कहा जाता है। इन ितथियों में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। अमावस्या को भी शुभ कार्य टालने की सलाह दी जाती है। नवमी में किसी भी नवीन कार्य को आरंभ करने की आज्ञा नहीं है।

तिथि तथा यात्रा विचार

भारतीय ज्योतिष में तिथियों को महत्वपूर्ण यात्राओं में सर्वाधिक महत्व दिया गया है। भारतीय यात्राओं में भले ही मुहूर्त या अन्य चीजों का ध्यान नहीं रखते हो परन्तु तिथियों पर विशेष ध्यान देते हैं। अर्थववेदीय ज्योतिष के अनुसार प्रतिपदा तिथि को कोई भी महत्वपूर्ण यात्रा आरंभ नहीं करनी चाहिए। द्वितीया तिथि को की गई यात्राएं विशेष लाभ देती है।

तृतीय तिथि को यात्रा से स्वास्थ्य लाभ तथा कल्याण प्राप्त होता है। चतुर्थी तिथि को यात्रा करने पर मृत्यु का भय होता है। पंचमी तिथि को आरंभ की गई यात्रा भाग्योदय, विजय, सफलता तथा अनेकों शुभ फल देने वाली है। षष्ठी तिथि को यात्रा करने से हानि होती है। सप्तमी तिथि की यात्रा भाग्यवृद्धि कर शुभ फल देती है।

अष्टमी में की गई यात्रा रोगकारक है अतः टालनी चाहिए। नवमी तिथि की यात्रा करने वाला लौटकर नहीं आता। दशमी को यात्रा करने पर सम्पत्ति तथा भूमि लाभ होता है। एकादशी को यात्रा करना शुभ बताया गया है। इस दिन यात्रा से निःसंदेह सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

द्वादशी की यात्रा करने से धन, समय तथा कार्य की हानि होती है। त्रयोदशी तिथि को यात्रा मैत्री संबंधों तथा संधिकार्यों के लिए प्रशस्त मानी गई है। चतुर्दशी तिथि की यात्रा करने पर चर कार्यों में सफलता मिलती है परन्तु स्थिर प्रकृति के कार्यों में हानि होती है। अमावस्या तथा पूर्णिमा को किसी भी प्रकार की यात्रा नहीं करनी चाहिए।

Acharya Anupam Jolly

आचार्य अनुपम जौली, यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है और अब आचार्य जी ने रमल शास्त्र पर अपनी कुछ अत्यंत विशिष्ट खोज करके यह साबित कर दिया कि कालांतर में विलुप्त हो चुकी हमारी अद्भुत एवं दिव्य ज्ञानवर्धक विद्यायें हमारे लिए बेहद लाभदायक थीं। जिन्हें अल्पज्ञान के चलते आप और हम नजऱ अन्दाज कर बैठे हैं।

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