भाग्य रेखा

“समय से पहले एवं भाग्य से अधिक कुछ नहीं मिलता”, Not before Time and not more than Fate. अतः यह प्रारब्ध (भाग्य) क्या है? ज्योतिष शास्त्रा द्वारा इसे किस प्रकार जाने? आइये ज्योतिष की प्रामाणिक व सरल विधि सामुद्रिक शास्त्रा द्वारा इसे जानने का प्रयास करें।

हाथ के मध्य में मणिबन्ध से शनि पर्वत की ओर जाने वाली रेखा भाग्य रेखा (शनि रेखा) कहलाती है। भाग्य रेखा कहीं से भी आरम्भ हो, इसकी समाप्ति शनि पर्वत पर होती है। अतः इसे शनि रेखा भी कहा जाता है। इसे फेट लाईन, लाईन आफ डेस्टिनी और भारतीय हस्त-शास्त्री इसे धन रेखा, यश रेखा, विद्या रेखा आदि के नाम से भी पुकारते हैं। इस रेखा से इन्सान की आर्थिक स्थिति, आर्थिक सम्पन्नता, कारोबार जीवन में प्रगति, समाज में मान सम्मान, व्यक्तित्व, परिवर्तन आदि को देखा जाता हैं। इस रेखा के सुस्पष्ट गहरी तथा दोष मुक्त होने पर ही भाग्य सम्बन्धी फल उत्साहपूर्ण होते हैं। छोटी रेखा भाग्यदायक, लम्बी रेखा सम्पत्ति व सौभाग्यदायक, मोटी शुभ फलदायक, पतली महाराज्यप्रद दायक और तिल चिन्हयुक्त रेखा भाग्य व्द्धि और सुखदायक होती है। ऐसा हस्तसंजीवनी में कहा गया हैं ।

भाग्य रेखा का उद्गम मणिबन्ध से, हस्तमध्य से, चन्द्र क्षेत्रा से हृदय रेखा से, शुक्र क्षेत्रा से, मस्तिष्क रेखा से तथा अन्य स्थलों से भी माना गया है ।

1). मणिबन्ध से:

(अ) मणिबन्ध की पहली रेखा से प्रारम्भ भाग्य रेखा यह बताती है कि व्यक्ति पारिवारिक जिम्मेदारियों से दबा हुआ है।

(ब) द्धितीय रेखा से प्रारम्भ भाग्य रेखा यह दर्शाती है कि व्यक्ति को अत्यधिक दुखों का सामना करना पड रहा है और यदि यह  रेखा हृदय रेखा पर समाप्त होती है तो असफल प्रेम को बताती है। जिससे उसका सम्पूर्ण जीवन नष्ट हो सकता है।

(स) तीसरी रेखा से आरम्भ भाग्य रेखा भी शुभ नहीं मानी गई है आर्थिक विपन्नता तथा पारिवारिक जिमेदारियों को बताती है।

2). चन्द्र स्थल से आरम्भ:

(अ) इस प्रकार की भाग्य रेखा वाला व्यक्ति असाधारण योग्यता रखता है।

(ब) अपने ही प्रयत्नों से प्रगति करते हैं।

(स) यदि ये रेखा हृदय रेखा को छूती हुई जाती है तो व्यक्ति का दाम्पत्य जीवन सुखमय होता है।

(द) चन्द्र क्षेत्रा से आरम्भ तथा मंगल के प्रथम क्षेत्रा पर समाप्त हो तो स्त्री का पुरूष तथा पुरूष का स्त्री की सहायता से भाग्योदय होता हैं। चन्द्र क्षेत्रा से आरम्भ होकर मध्य हथेली में होती हुई भाग्य रेखा सूर्य क्षेत्रा की ओर चली गई हो तो व्यक्ति कलाकौशल, लोकप्रिय तथा उसे मित्रों से लाभ होता है।

3). शुक्र क्षेत्र से आरम्भ:

(अ) ऐसी भाग्य रेखा मित्रों और संबंधियों के सहयोग से भाग्योदय होना बताती है।

(ब) यदि भाग्य रेखा स्पष्ट और हृदय रेखा की ओर अग्रसर न होती हो तो व्यक्ति अपनी मर्जी के अनुसार कुछ करने में सफल नहीं होगा। प्रेम संबंधों में फंस कर दुष्परिणाम भुगतता है।

4). आयु रेखा से आरम्भ:

आयु रेखा से आरम्भ होकर शनि पर्वत की ओर अग्रसर होने वाली भाग्य रेखा यह बताती है कि वह व्यक्ति अपने परिवार के लिये बहुत ही सहयोगी हैं वह अपने सुखों की ओर कम चिन्तित होता है। स्वयं उन्नति कर परिवार को उन्नति की ओर ले जाते हैं ।

5). मस्तिष्क रेखा से आरम्भ:

भाग्योदय विलम्ब से होना बताती है। निराश व संघर्ष-पूर्ण जीवन बिताते हुए 35.36 की आयु के बाद ही जीवन में सफलता प्राप्त होती है। ऐसे लोगों की इच्छा शक्ति प्रबल होती है तथा मानसिक रूप से सशक्त होते हैं। ये लोग किसी चीज को असंभव नहीं मानते हैं – यह इनकी विचारधरा होती है।

6). हृदय रेखा से आरम्भ:

संपूर्ण जीवन संघर्षमय होता है, जीवन के अन्तिम समय में सुख का अनुभव होता है। बच्चे आज्ञाकारी तथा बुढापे में पूर्ण सहयोगी होते हैं। दूसरों की सहायता के लिये तत्पर रहते हैं।

इसके अतिरिक्त भाग्य रेखा का आरम्भ राहु क्षेत्रा, नेपच्यून क्षेत्रा, हर्षल क्षेत्रा आदि से भी माना जाता हैं, जिसके लिये गहन अध्ययन व अनुसंधान की आवश्यकता है।

दोहरी भाग्य रेखा

कई हाथों में दोहरी भाग्य रेखा भी देखी जाती है, जो समानान्तर चलती है यदि यह रेखा सुस्पष्ट हो तो जीवनयापन के एक से ज्यादा श्रोतों को इंगित करती है – एक मुख्य तथा दूसरा सहायक या शौकिया। यदि यह रेखा स्पष्ट न हो तो वह व्यक्ति भाग्य पर भरोसा न करने वाला तथा भौतिकवादी होता है। इसके अतिरिक्त अंगुष्ठ व अंगुलियों की ओर अग्रसर होती भाग्य रेखा के परिणाम इस प्रकार हैं-

(क) अंगूठे की ओर – राज्य सुख प्राप्ति।

(ख) तर्जनी की ओर राज्य में उच्च पद प्राप्ति।

(ग) मध्यमा की ओर यश प्राप्ति।

(घ) अनामिका की ओर धनधान्य व सम्पन्नता।

(ड) कनिष्ठा प्रतिष्टित व यशस्वी।

अन्य:-

भाग्य रेखा मध्य में खण्डित होने से या टूट जाने से कुछ समय के लिए जीवन निष्क्रिय हो जाता है।

यदि भाग्य रेखा हाथ को पार करके मध्यमा में पहुँच जाये तो लक्षण शुभ नहीं होता, वह व्यक्ति हमेशा सीमा और नियम कायदे का उल्लंघन करता है।

जंजीरनुमा भाग्य रेखा व्यक्ति को दुःख में डाल देती है।

भाग्य रेखा तीन जगह से बीच में टूटने से वात रोग द्वारा कष्ट होता है।

यदि भाग्य रेखा शनि पर्वत तक जाती है तो व्यक्ति की वृद्धावस्था सुखमय व्यतीत होती है।

भाग्य रेखा पर द्वीप, कटाव अशुभ होते हैं- कई प्रकार की बाधाएं, आर्थिक विपन्नता तथा दुर्घटना की ओर इंगित करते हैं। भाग्य रेखा के साथ सहायक रेखाएं अत्यन्त सम्मानित जीवन बताती हैं। लहरदार या टेडी मेढ़ी रेखा अशुभ होती हैं। भाग्य रेखा से निकली हुई शाखाऐं यदि उपर की ओर जा रही हो तो अत्यधिक धन लाभ को बताती हैं। उद्गम स्थान से यह शाखाएं निकलती हो तो विदेश यात्रा की ओर इंगित करती हैं।

सुस्पष्ट व अच्छी भाग्य रेखा भाग्ययोदय को बताती है तथा अस्पष्ट, टूटी, लहराती हुई भाग्य रेखा कष्टपूर्ण जीवन की ओर इंगित करती हैं। शनि पर्वत तक गई भाग्य रेखा शुभ होती है, उसके आगे प्रथम पोरवे तक गई यह रेखा अशुभ है- आर्थिक विपन्नता एवं कष्टमय जीवन को बताती है।

जिन हाथों में भाग्य रेखा नहीं पायी जाती वे जीवन में सफल तो होते हैं पर उनमें विशेष निखार या तेज नहीं पाया जाता है। ऐसे लोगों को सामान्य सुखी कहा जा सकता है।

Acharya Anupam Jolly

आचार्य अनुपम जौली, यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है और अब आचार्य जी ने रमल शास्त्र पर अपनी कुछ अत्यंत विशिष्ट खोज करके यह साबित कर दिया कि कालांतर में विलुप्त हो चुकी हमारी अद्भुत एवं दिव्य ज्ञानवर्धक विद्यायें हमारे लिए बेहद लाभदायक थीं। जिन्हें अल्पज्ञान के चलते आप और हम नजऱ अन्दाज कर बैठे हैं।

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