Jyotish

संतान के जन्म में “पाया” का महत्व

एक गृहस्थ के लिए उसके जीवन में संतान का जन्म सबसे ज्यादा खुशियों वाला पल होता है l उसके बाद यह चिंताएं होती है की बालक हमारे लिए और स्वयं के लिए किसी भी प्रकार से कष्टदायक तो नहीं है l  इसके लिए ज्योतिष में गंडमूल नक्षत्र और पाया क्या है के बारे में ज्योतिषी जी से जानने के लिए लोग अक्षर जाते दीखते है l

दरअसल पहले बाल मृत्युदर की संख्या आज के परिपेक्ष में बहुत ज्यादा थी, बच्चों का जन्म घरों में ही होता था l अनेक बार अप्रशिक्षित दाईयों के हाथ में ही जच्चा व बच्चा की कुशलता रहती थी। जन्मपत्रिका में अष्टम चंद्रमा या चन्द्रमा की कमजोर स्थिति से नवजात के बचने की सम्भावना क्रमशः बहुत क्षीण होती थी। पुरानी पीड़ियों की कहानियों में प्रसव के दौरान ही माँ व बच्चे का जीवन कई बार समाप्त हो जाया करता था।

ऐसे समय में लोग पाया इत्यादि का विचार भी बहुत किया करते थे l पाया का निर्धारण चंद्रमा की भाव में स्थिति और नक्षत्र आदि विधियों से की जाती थी l

संस्कृत में पाद या पद का मतलब है- एक चौथाई। अत: कुण्डली के 12 भावों को चार पायों में बांटा गया है।

  1. सुवर्ण (सोना) पाद- जब चन्द्र 1, 6, 11 भावों में हो तो सोने के पाए में जन्म होता है। सोने की अधिक देखभाल की जरूरत होने से आशय है कि बालक तन मन से कुछ नाजुकपन लिए होता है।
    नक्षत्र अनुसार : रेवती, अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहणी या मृगशिरा नक्षत्र में जन्म होने पर सोने का पाया होता हैं।
  2. रजत (चांदी) पाद- जब चन्द्र 2, 5, 9 भावों में हो तो चांदी के पाए में जन्म होता है। चांदी अपेक्षाकृत सस्ती होने से ऐसे बालकों को प्राचीनों ने अपेक्षाकृत कम देखभाल की दरकार मानी है। इन बच्चों में रोगप्रतिरोधक शक्ति अच्छी रहती थी।
    नक्षत्र अनुसार : आद्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा या स्वाती नक्षत्र में जन्म होने पर चाँदी का पाया होता हैं।
  3. ताम्र (तांबा) पाद- जब चन्द्र 3,7, 10 भावों में हो तो तांबे के पाए में जन्म है। इसे प्राचीनों ने स्वास्थ्य व अरिष्ट से बचाव के लिए सबसे समर्थ माना है।
    नक्षत्र अनुसार : विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, श्रवण, धनिष्ठा या शतभिषा नक्षत्र में जन्म होने पर ताम्बे का पाया होता हैं।
  4. लौह (लोहा) पाद- जब चन्द्र 4, 8, 12 भावों में हो तो लोहे के पाए में जन्म होता है। इसे स्वास्थ्यहानि व अरिष्ट से बचाव के लिए सबसे कमजोर माना जाता है। सुवर्णपाद के नाजुकपन के साथ साथ इसमें अरिष्ट होने की सम्भावना भी सर्वाधिक होती है।
    नक्षत्र अनुसार : पूर्वाभाद्रपद या उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में जन्म होने पर लोहे का पाया होता हैं।

लग्नबली हो, चन्द्रमा को पक्षबल मिला हो, अन्यथा किसी अशुभ वेला में जन्म न हो, बड़ा बालारिष्ट न दिखे तो पाए का दोष शान्त रहता है।

Acharya Anupam Jolly

आचार्य अनुपम जौली, यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है और अब आचार्य जी ने रमल शास्त्र पर अपनी कुछ अत्यंत विशिष्ट खोज करके यह साबित कर दिया कि कालांतर में विलुप्त हो चुकी हमारी अद्भुत एवं दिव्य ज्ञानवर्धक विद्यायें हमारे लिए बेहद लाभदायक थीं। जिन्हें अल्पज्ञान के चलते आप और हम नजऱ अन्दाज कर बैठे हैं।

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