वृक्ष का वास्तु में महत्व

आचार्य वराहमिहिर के अनुसार –

‘‘ प्रान्तच्छायाविनिर्मुक्ता न मनोज्ञा जलाशया:। यस्मादतो जलप्रान्तेष्वारामान- विनिवेरोयेत।।’’

अर्थात- वृक्ष, लता, गुल्म आदि के बिना नवन, जलाशय, बावड़ी, तालाब आदि शोभित नहीं होते है, अत: इनके आस-पास चारो और बाग, बगीचा, उपवन अवश्य लगाने चाहिए।

पर्यावरण को ठीक रखने के लिए घर के आस-पास पेड़-पौधों का होना बहुत ही आवश्यक है। प्रकृति का संतुलन बनाने में वृक्षों का योगदान सर्वोपरि है। वृक्षों की जड़, शाखा, पत्ता, छाल, फल-फूल आदि सभी चीजें मानव-जाति के लिए उपयोगी हैं।

वास्तुशास्त्रीय ग्रन्थ वृहद्वास्तुमाला में कहा गया है कि जो व्यक्ति एक पीपल, एक नीम, एक बरगद, दस इमली, तीन कैथ, तीन बेल, तीन आँवला और पाँच आम के वृक्ष लगाता है वह नरक के दर्शन नहीं करता । कहा भी गया है-

‘‘ अस्वत्यमेकं पिचुमन्देकं न्यगा्रेचयेकं दशचित्र्चिणीकम्।

कपित्यविल्वामलकत्रयत्र्च पज्चाम्रवापी नरकं न पश्येत।।’’

प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में पेड़ जरुर लगाने चिहिए l आपके जन्म नक्षत्र की तरह प्रत्येक नक्षत्र से सम्बंधित वृक्ष भी होता है l आपके जन्म नक्षत्र से जिस वृक्ष का जन्म नक्षत्र मिलता है वहीं आपका आराध्य वृक्ष होता है जिसके पूजन से आप लाभान्वित हो सकते है।

क्र.सं. जन्म नक्षत्र आराध्य वृक्ष
. अश्विनी कुचला
. भरणी आँवला
. कृतिका गूलर
. रोहिणी जामुन
. मृगशिरा खैर
. आद्र्धा कदम्ब
. पुनर्बसु बेलपत्र
. पुष्प पीपल
. अश्लेषा नागचंपा
१०. मघा वट
११. पूर्वाफाल्गुनी पलाश
१२. उत्तराफाल्गुनी पायरी
१३. हस्त पाई
१४. चित्रा बेलपत्र
१५. स्वाति अर्जुन
१६. विशाखा नागकेशर
१७. अनुराधा नागकेशर
१८. ज्येष्ठा सांवर
१९. मूल राड
२०. पूर्णषाठा वेत
२१. उत्तराषाठा कटहल
२२. श्रवण रूई
२३. धनिष्ठा शमी
२४. शतभिवा कदम्ब
२५. पूर्णाभाद्रपद आम
२६. उत्तराभाद्रपद आम
२७. रेवती मोह

राशि अनुसार वृक्ष :

मेष- खादिर, वृष- गूलर, मिथुन- अपामार्ग, कर्क- पलाश, सिंह- आक, कन्या- दुर्बा, तुला- गूलर, वृश्चिक- खादिर, धनु- पीपल, मकर- शमी, कुम्भ- शमी, मीन- कुश

ग्रह अनुसार वृक्ष/ वनस्पति :

सूर्य- आक, चन्द्र- पलाश, मंगल- खादिर, बुध- अपामार्ग, गुरू- पीपल, शुक्र- गूलर, शनि- शमी

आराध्य वृक्ष के काटने से वृक्ष काटने वाले मनुष्य का मस्तिष्क विकृत हो सकता हैं। उसका गृहस्थ जीवन कलह पूर्ण होकर उसकी संताने असामाजिक कार्यो में लिप्त होकर मानसिक क्लेश का कारण बन सकती है। आर्थिक संकट से वह सदा पीडि़त रह सकता है, साथ ही उसकी मान-प्रतिष्ठा धूमिल हो सकती हैं।

अपने आराध्य वृक्ष का पेड़ लगाकर उसकी सेवा करें। आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगीं।

वास्तुशास्त्र में उचित स्थान पर वृक्षारोपण एवं घर में बगीचे की व्यवस्था को बहुत महत्वपूर्ण माना गया हैं। सभी तरह के वृक्ष प्रत्येक दिशा के लिए अनुकूल नहीं होते और न ही प्रत्येक दिशा में सभी तरह के वृक्षों से हमें लाभ मिलता हैं। घर में चार दीवारी के अन्दर दूध वाले, कांटे वाले वृक्षों को नही लगाना चाहिए, साथ ही घर में इतने घने वृक्ष भी नहीं होने चाहिए जिससे सूर्य का प्रकाश अवरूद्ध हो अन्यथा इस तरह के घर असमृद्धिकारी होते हैं।

घर के उत्तरी एवं पश्चिमी भाग में बगीचा चार दीवारी के अन्दर लगाना उपयुक्त माना गया है। उत्तर-पश्चिम में अशोक, कनक, चम्पा, नारियल आदि के वृक्ष शुभप्रद होते हैं। उत्तर में वृक्ष दूर-दूर पर लगाना चाहिए। तुलसी का पौधा पूर्व में , या ईशान में शुभ होता है एवं पर्यावरण प्रदूषण को दूर करता है।

चार दीवारी के बाहर इतनी दूर पर कि वृक्ष की छाया घर पर न पड़े । दक्षिण में गलूर एवं पलाश, उत्तर में पाकड़, नीम, कनक चम्पा आदि शुभ माने गये हैं।

पूर्व दिशा में छोटे पौधे कम ऊंचाई के लगाने चाहिए, जिससे सूर्य किरणों का निरन्तर प्रवाह बना रहे। बगीचे के मध्य में या घर के मध्य में कोई पेड़ न लगाएँ । केकटस आदि घर में लगाना वर्जित है। बेर का वृक्ष अपनी चार दीवारी के अन्दर नहीं होना चाहिए, इससे अनावश्यक वैर भाव-मुकदमें बाजी होने लगती हैं।

घर की दीवारों पर किसी भी प्रकार की बेल नहीं चढ़ाना चाहिए। घर के मध्य में पनी का टांका, झरना, स्वीमिंग पूल आदि नहीं बनाना चाहिए बांस को चार दीवारी के किनारे नहीं रोपना चाहिए। दक्षिण-पश्चिम में भरे गमले रखे, भारी मूर्तियों को लगाए तथा इस क्षेत्र को अधिक से अधिक भारी बनावें।

वास्तु शास्त्र के अनुसार- कौन सा वृक्ष किस दिशा में लगाएँ, जिसके फलस्वरूप वास्तुदोष ठीक किया जा सकता है। जो निम्रानुसार समझना चाहिए।

अशोक वृक्ष- वास्तु के अनुसार अशोक के वृक्ष को उत्तर दिशा में लगाना चाहिए। यह शुभफलप्रद होता है, साथ ही घर में लगे हुए अन्य अशुभ वृक्षों का दोष समाप्त करता हैं।

केले का वृक्ष- यह शुभ वृक्ष होता है, इसको घर के ईशान क्षेत्र में लगाना अत्यन्त शुभ होता है। केले एवं तुलसी के पौधे घर में साथ हो तो यह और अधिक शुभ फलप्रद माना जाता हैं। (कुछ उत्तर भारतीय ग्रंथों में केले के वृक्ष को घर में लगाने के लिए मना किया गया है और मंदिर में लगाने के लिए हाँ की गई है l )

आक (श्वेतार्क)- आक को मदार, अकवन आदि नामों से जाना जाता है, यह पौधा सर्वत्र उत्पन्न होता है, जो बिना किसी देखभाल के पनपता हैं। यह कई तरह का होता है, परनतु जिसमें श्वेत पुष्प लगते हो, उसे वास्तु दोष निवारण के लिए प्रवेश द्वार के निकट लोग लगाते है। यह दूध वाला पौधा होता है, अत: घर के अन्दर वर्जित है, बाहर इसे एक चबूतरा बनाकर लगाना चाहिए। इसकी जड़ के गणेश जी बनाकर पूजा करने से गणेश जी प्रसन्न होते है और उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। आक की लकड़ी से हवन करने से सभी प्रकार के रोगों का शमन होता है। यथा-अर्केण नश्यते व्याधि।

कमल- घर के ईशान क्षेत्र के समीप जल संग्रह करके कम का पोषण करने से लक्ष्मी का वास घर में बन रहता हैं।

पीपल, गूलर व पाकड़ का वास्तु में महत्व-

‘‘याम्यादिष्वशुभफला जाटास्तरव: प्रदक्षिणेनैते।

उदगादिषु प्रशस्ता: प्लक्षवटोदुम्बराश्वत्या।।’’

घर में पश्चिम दिशा में पीपल, दक्षिण दिशा में गूलर तथा उत्तर दिशा में पाकड़ का वृक्ष शुभ फलप्रद माना जाता हैं। इसके विपरीत दिशा में रहने पर ये वृक्ष विपरहीत फल देने वाले होते हैं।

पपीता- वास्तुशास्त्र में पपीते के वृक्ष का घर में होना अशुभ कहा गया है। अत: यदि घर में हो तो अन्यत्र स्थानांतरित कर देना चाहिए।

नारीयल- नारियल के वृक्ष का घर की सीमा में होना शुभ होता हैं। जिसके फलस्वरूप मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि होती हैं।

अनार- घर में फल देने वाला अनार का पौध शुभ होता है। बशर्ते यह आग्रेय एवं नेऋव्य कोण में नहीं हों।

बरगद- वास्तुशास्त्र में वट वृक्ष को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हैं। वास्तु के अनुसार किसी भी भवन अथवा प्रतिष्ठान के पूर्व मे वट वृक्ष का होना अत्यंत शुभ होता हैं। कहा भी गया है- ‘‘वट: पुरस्ताद- धन्य: स्याद्’’

हल्दी- इसका घर की सीमा में होना अशुभ होता हैं।

सीताफल- सीताफल के पौधे का घर की सीमा में होना शुभ नहीं होता हैं।

आवंला- वास्तु की दृष्टि से आवंले के वृक्ष का घर की सीमा में होना शुभ होता है। इसकी पूजा करने से शुभफल प्राप्त होते हैं।

तुलसी का पौधा- तुलसी को भारतीय संस्कृति में धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व प्राप्त हैं। वह मनुष्य अवश्य ही बैकुंठ धाम में हमारों वर्ष तक रहने का अधिकारी होता है, जिसके पास गृह में तुलसी का पौधा सदा विद्यमान रहता है। यथा-

‘‘यावद् दिनानि तुलसी रोपिता यद्गृहे वसेत्।

तावद् वर्ष सहस्त्राणि बैकुण्ठ स महायते।।

पद्य पुराण में भी कहा गया है कि जहाँ तुलसी-वृक्ष के उपवन लगे रहते है और जहाँ कमल-पुष्पों के भी उपवन सुशोभित होते रहते है तथा तहाँ वैष्णव लोग निवास करते है, वहां साक्षात्- भगवान् विष्णु निवास करते हैं। तुलसी का पौधे घर के ईशान क्षेत्र या पूर्व दिशा में लगाना शुभफलप्रद होता हैं।

जामुन- वास्तु में घर की सीमा में दक्षिण दिशा में जामुन का वृक्ष हो शुभ कहा गया हैं। जबकि अन्य दिशाओं में साधारण फलप्रद बताया गया हैं।

आम- वास्तु की दृष्टि से फलदार वृक्ष आम, अमरूद आदि घर की सीमा में शुभ नहीं माना गया हैं। ऐसे वृक्ष संतान हानिकारक होते हैं।

नीम- घर के वामव्य कोण में नीम के वृक्ष का होना अति शुभ होता है । इस प्रकार जो व्यक्ति नीम के सात पेड़ लगाता है उसे मृत्योपरांत शिवलोक की प्राप्ति होती है।

मेहंदी- मेहंदी के पौधे का घर में होना अशुभ होता हैं।

बिल्व- बिल्व वृक्ष का घर की सीमा में होना अति शुभ होता है। भगवान शिवजी का प्रिय वृक्ष व पत्र बिल्व होता है। यह वृक्ष जिस घर में होता है वहाँ धन-संपदा की देवी लक्ष्मी पीढिय़ों तक वास करती हैं।

पलाश- वास्तु की दृष्टि से प्लाश के वृक्ष का घर की सीमा में होना अशुभ हैं।

बबूल- बबूल का घर में होना अशुभ होता है। जिस घर में बबूल होता है वहां बहुत क्लेश होतें हैं।

बांस- बांस का घर में होना अत्यंत अशुभ होता हैं।

अरंडी- वास्तु की दृष्टि से अरंडी के पौधे का घर की सीमा में होना अत्यंत ही अशुभ माना गया हैं।

गुलाब- वास्तु में शूल वाले पौधे का घर में होना अशुभ माना गया है किन्तु गुलाब का पौध अशुभ नहीं होता।

शुभ वृक्ष- घर की सीमा में अशोक, मौल श्री, शमी, चंपा, अनार, सुपारी, कटहल, केतकी, मालती, कमल, चमेली, नारियल, केला आदि के वृक्ष होने से घर में लक्ष्मी का विस्तार होता है, और उनकी कृपा बनी रहती हैं। जैसा बराहमिहिर ने भी कहा है-

‘‘पूजितान- वपेदन्यान- पुन्नामाशोकारिष्टबकुलपनसान् शमीशालौ।।’’

अर्थात् शुभेच्छुक गृहस्वामी को उत्तम व प्रशंसित वृक्ष पुन्नाग, अशोक, अशिष्ट मौलसरी, कटहल शमी व शाल में से कोई भी वृक्ष लगा देने से दोष निवृत हो जाते हैं।

वृक्ष लगाने की कुछ खास बातें-

१. मुख्य द्वार को पुष्प, पल्लव, फल, कुम्भ व लताओं आदि से सुसज्जित रखना चाहिए। जिसके फलस्वरूप घर में सुख एवं शांति बनी रहती हैं।

२. भवन में बाग-बगीचा अथवा वृक्षों का उसकी सीमा में उत्तर या पश्चिम दिशा में होना शुभ होता हैं।

३. मुख्य द्वार के सामने किसी भी प्रकार का वृक्ष न लगायें। अन्यथा द्वार वेध होता है।

४. घर के मध्य स्थान में भी वृक्ष लगाना वर्जित हैं।

५. कांटेदार वृक्ष घर की सीमा में कभी भी नहीं लगाएँ अन्यथा शत्रु भय होता हैं।

६. घर की सीमा में तुलसी का पौध शुभ होता हैं।

७. चार दीवारी के बाहर इतनी दूरी पर वृक्ष लगायें कि उनकी छाया घर पर न पड़े।

८. वास्तु में कैक्टस एवं दूध वाले पौंधों को नकरात्मक ऊर्जा के सृजन का माध्यम मानते है अत: इने घर के अंदर न रखें।

९. ऐसा माना जाता है कि बोनसाई के पौधे निकास को अवरूद्ध करते है, जिस तरह पौधा का विकास अवरूद्ध रहता है, उसी तरह की मानसिकता का वातावरण हमें अनुभव होने लगता है अत: बौनसाई के पौधे बगीचें में घर के बाहर ही रखे।

१०. ब्राहम्ण वर्ण एवं आध्यात्मिक कार्यो से जुड़े अन्य लोगों के लिए देवदारू, चन्दन, शमी, हुआ आदि वृक्ष घर की उचित दिशा में लगाकर उनका पोषण अवश्य करना चाहिए।

११. क्षत्रिय वर्ण वाले मनुष्यों को खैर, बेल, अर्जुन शिरस के वृक्षों का पालन पोषण करना चाहिए।

१२. वैश्य वर्ण के लोगों के लिए शिरीष, नीम का बेल के वृक्षों के पालन-पोषण से घर के सभी कार्यो सिद्ध होते हैं।

१३. अन्य वर्णो के घर की सीमा में अमलतास और मोलश्री के वृक्ष तथा पान के पौधे लगाने चाहिए।

१४. यदि घर में मनी प्लांट हो तो उसका आरोहण शुभ होता हैं।

१५. अशुभ वृक्ष को काटना संभव न हो तो उसके समीप अन्य शुभदायक वृक्षों को लगा देने से उसका दोष दूर हो जाता हैं।

Acharya Anupam Jolly

आचार्य अनुपम जौली, यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है और अब आचार्य जी ने रमल शास्त्र पर अपनी कुछ अत्यंत विशिष्ट खोज करके यह साबित कर दिया कि कालांतर में विलुप्त हो चुकी हमारी अद्भुत एवं दिव्य ज्ञानवर्धक विद्यायें हमारे लिए बेहद लाभदायक थीं। जिन्हें अल्पज्ञान के चलते आप और हम नजऱ अन्दाज कर बैठे हैं।

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