Pranic Healing

प्राणशक्ति उपचार की प्रकृति

प्राणशक्ति  उपचार शरीर के संपूर्ण ढ़ांचे पर आधारित है। मनुष्य का संपूर्ण जैविक शरीर मुख्य: दो भागों से बना होता है। एक दृश्य शरीर, जो दिखाई देता है तथा दूसरा न दिखाई देने वाला ऊर्जा शरीर जिसे जीव द्रव्य शरीर कहते है। मनुष्य का जो शरीर हमें दिखाई देता है। जिसे छू सकते हैं और जिससे हमारा अधिक परिचय होता है, वह दृश्य शरीर कहलाता है या उसे दिखाई देने वाला भौतिक शरीर भी कह सकते हैं। जीवद्रव्य शरीर अदृश्य रूप से वह चमकदार आभा शरीर है जो दृश्य शरीर को भेद कर उसके बाहर चारों ओर चार या पांच इंच तक फै ला होता है। परंपरागत रूप से परलोकदर्शी इस ऊर्जा शरीर को वायवी शरीर या वायवी चोला (ईथरिय डबल्) कहते हैं।

प्राणशक्ति उपचार क्या है ?

प्राणशक्ति उपचार एक पुराना विज्ञान और उपचार की एक कला है जो संपूर्ण दृश्य शरीर का उपचार करने के लिए प्राणशक्ति या ओजस्वी ऊर्जा का उपयोग करती है। इसमें रोग के शरीर के जीवद्रव्य और प्राणशक्ति को प्रभावित भी किया जाता है इसे अन्य नामों जैसे औषघ क्विगांग (की कुं या प्राण उपचार) अतिभौतिक या मानसिक उपचार, ओज उपचार, चिकित्सकीय छुअन, हाथ का स्पर्श, चुबंकीय उपचार, विश्वास उपचार ओर चमत्कारी उपचार नाम से भी जाना जाता है।

प्राण या प्राणशक्ति

प्राण शक्ति या आभा या वह ओजस्वी ऊजा्र या जीवन शक्ति है जो शरीर को जीवित व स्वस्थ रखत है। ग्रीक भाषा में इसे प्राणत्मा, पोलिनेशिन में मन और हीबू में रूह या जीवन की सांस कहते हैं। उपचारक रोगी पर इसी प्राणशक्ति या ओजस्वी ऊर्जा को प्रक्षेपित (संचरित) करता है। इस प्रक्रिया से इस तथाकथित ‘‘अचंभित करने वाला उपपचार’’ किया जाता है।

प्राणशक्ति या प्राण के मुख्यत: तीन स्रोत हैं : सौर प्राण शक्ति, वायु प्राणशक्ति और भू या भूमि प्राणशक्ति। सूर्य के प्रकाश से प्राप्त प्राणशक्ति और प्राणशक्ति कहलाती है। यह पूरे शरीर की शक्त और स्वास्थ्य प्रदान करती है। उसे धूप में खड़े रह कर यानी धूप स्नान द्वारा या धूप में रखा पानी पीकर प्राप्त किया जात सकता है। अधिक सय तक धूप में खड़े रहने या बहुत अधिक सौर-प्राण शरीर को नुकसान भी पहुंचा सकता है क्योंकि यह बत शक्तिवर्धक होता है।

जो प्राणशक्ति या प्राण वायुमंडल में पाया जाता है। उसे वायु प्राण या प्राणवायु गोलिका कहते है। श्वसन क्रिया के माध्यम से फेफड़ों द्वारा या जीवद्रव्य शरीर के ऊर्जा केंद्रों के माध्यम से वायु प्राणशक्ति ग्रहण की जाती है। इन र्ऊा केन्द्रों को चक्र कहते हैं। अधिक वायु प्राणशक्ति तेजी से व कम समय से ली जाने वाली श्वास की अपेक्षा गहरी, धीमे और एक लय-ताल में जी जाने वाली श्वसन क्रिया द्वारा प्राप्त की जा सकती है। विशेष प्रकार का प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति अपनी त्वचा के सूक्ष्म छिद्रों द्वारा भी इसे प्राप्त कर सकता है।

भूमि में पायी जाने वाली प्राणाशक्ति भू-प्राणशक्ति या भू-प्राणशति गोलिका कहलाती है। इसे पैर के तलुवों से प्राप्त किया जाता है। यह प्रक्रिया बिना ध्यान दिये और अपने आप ही होती रहती है। नंगे पैर चलने से शरीर द्वारा ग्रहण किये गये भूमि प्राण की मात्रा में वृद्धि होती है। अपनी प्राणशक्ति बढ़ाने, कार्य करने की क्षमता और अच्छे सोच-विचार की योग्यता बढ़ाने के लिए कोई भी व्यक्ति भूमि-प्राणशक्ति प्राप्त करने की क्रिया सीख सकता है।

सूर्य के प्रकाश, वायु और भूमि के संपर्क में आने वाला पानी इन तीनों से प्राणशक्ति प्राप्त करता है। पेड़-पौधें, धूप, वायु, जल और भूमि से प्राणशक्ति सोखते हैं। मनुष्य तथा जानवर धूप, वायु, भूमि से प्राणशक्ति सोखते हैं। मनुष्य तथा जानवर धूप, वायु, भूमि, जल और भोजन (बासी भोजन की अपेक्षा ताजे भोजन में अधिक प्राणशक्ति पायी जाती है।) द्वारा प्राणशक्ति प्राप्त करते हैं।

उपचार के लिये प्राणशक्तिको दूसरे व्यक्ति में भी प्रक्षेपित किया जा सकता है। जिनके पास अत्यधिक प्राणशक्ति है उनके आस-पास रहने वाले व्यक्ति भी उनके प्रभाव से स्वयं को अच्छा और जीवंत महसूस करते हैं। इस तरह जिनके पास प्राणशक्ति की कमी होती है वे अन्जाने में भी दूसरे व्यक्ति से प्राणशक्ति प्राप्त करते हैं। इसलिए कभी आप ऐसे व्यक्त् िसे मिले होंगे जिसे साथ रह कर आपको बिना किसी कारण ही थकान या खालीपन महसूस हुआ होगा।

कुछ पेड (जैसे पाईन वृक्ष या पुराने, बड़े, स्वस्थ पेड़) अधिक मात्रा में प्राणशक्ति का रिसाव करते हैं या छोड़ते है। इन पेड़ों के नीचे थके या बीमार आदमी के आराम करने या लेटने से बहुत अधिक फायदा होता है। यदि पेड़ से शबदों में बीमार व्यक्ति के स्वास्थ्य लाभ की कामना की जाए तो और अधिक अच्छे परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। कोई भी व्यक्ति अपनी जाग्रत अवस्था में इन पेड़ों से अपने हाथों द्वारा प्राणशक्ति प्राप्त कर सकता है। अधिक मात्रा में प्राणशक्ति प्राप्त रने से वह अपने शरीर में सिहरन या झुरझुरी और सम्मोहन महसूस करेगा। इस प्रक्रिया को कुछ बार अभ्यास करके सीखा जा सकता है।

कुछ क्षेत्रों में अन्य स्थानों की अपेक्षा अधिक प्राणशक्ति होती है। इनमें से कुछ अत्यधिक ऊर्जा क्षेत्रों में उपचार केन्द्र खोले जा सकते है।

खराब मौसम के कारण कुछ व्यक्ति न केवल बदलते तापमान से बीमार पड़तें हैं बल्कि सौर और वायु प्राणशक्ति (ओजस्वी ऊर्जा) में कमी के कारण भी बीमार पड़तें हैं। इस कारण अधिकतर व्यक्त् िमानसिक व शारीरिक रूप से सुस्त दिखाई देते हैं या संक्रमित रोगों से पीडि़त हो जाते हैं। इससे बचने के लिए वायुमंडल और भूमि से लगातार प्राणशक्ति प्राप्त करते रहना चाहिए। परलोकदर्शन या दिव्यदर्शन से यह पता चला है कि रात की अपेक्षा दिन में अधिक प्राणशक्ति पायी जाती है। प्रात:काल में प्राणशक्ति की मात्रा बहुत ही कम स्तर पर यानी लगभग तीन या चार अंश होती है।

जीवद्रव्य शरीर

दिव्यदर्शियों ने अपने परामानसिक पद्धतियों से यह पाया कि प्रत्येक व्यक्ति अपने शरीर के चारों और एक चमकदार शक्ति या आभा द्वारा घिरा रहता है जिसे जीवद्रव्य शरीर कहा जाता है। अपने दिखाई देेने वाले शरीर की तरह ही इसको भी एक सिर, शरीर की तरह ही होता है। इसीलिए दिव्यदर्शियों ने इसे वायवी शरीर या ईथरीय डबल् नाम दिया है।

‘‘जीवद्रव्य’’ (बायोप्लाज्मिक) शब्द का निर्माण दो शब्दों से हुआ है : पहला जीव (बायो) यानी जीवन और दूसरा द्रव्य (प्लाज्मा) यानी पदार्थ का चौथा रूप। पदार्थ के पहले तीन रूप ठोस, द्रव्य और गैस है। द्रव्य एक आयनीकृत गैस हे यानि इस गैस में धनात्मक और ऋणात्मक आवेश के अणु होते हैं।यह रक्त द्रव्य की तरह नहीं होता। जीव द्रव्य का अर्थ एक जीवित शक्ति है जो अदृश्य सूक्ष्म पदार्थ या वायवी पदार्थ का बना होता है। विज्ञान ने किर्लियन फाटोग्राफी के माध्यम से जीवद्रव्य शरीर की पुनर्खोज की है। किर्लियन फोटोग्राफी के माध्यम से जीवद्रव्य वस्तुओं जैसे जीवद्रव्य उंगलियों, पत्तियों आदि का अध्ययन करने और उनके चित्र लेने में सफल हुए हैं। इसी जीवद्रव्य शरीर द्वारा प्राणशक्ति या ओजस्वी ऊर्जा ग्रहण कर पूरे भौतिक शरीर में फैलायी या संचरित की जाती है।

शिरोबिन्दु या जीवद्रव्य नाडिय़ां

सामान्य भौतिक शरीर में जिस तरह रक्त के संचार के लिए नाडिय़ां या रक्त नलिकांए होती हैं, उसी प्रकार जीवद्रव्य शरीर में भी न दिखाई देने वाली बारीक शिरोबिन्दु या नाडिय़ां होती हैं जिनके द्वारा प्राणशक्ति और जीवद्रव्य पदार्थ पूरे शरीर में होती है। योग विद्या में इन्हें बड़ी और हजारों छोटी जीवद्रव्य पदार्थ पूरे शरीर में संचरित होता है। कई बडी और हजारों-छोटी जीवद्रव्य पदार्थ पूरे शरीर होती हैं। योग विद्या में इन्हें बड़ी और छोटी नाड़ी कहते हैं। इन नाडिय़ों द्वारा प्राणशक्ति का संचार होता है जो पूरे शरीर को पोषित और शक्ति प्रदान करता है।

प्राणशक्ति का एक्युपंचर, एक्युप्रैशर और रिफ्लैक्सोलोजी में प्रयोग :

एक्यूपंचर चीन के औषध विज्ञान का प्राचीन विज्ञा है जिसमें रोगी के शरीर की ओजस्वी शक्ति को सुइयों के माध्यम से सही स्थान पर लाकर बीमारी का इलाज किया जाता है। सुइयों को रोगी के शरीर में खास जगहों पर चुभो कर अतिरिक्त प्राणशक्ति को शरीर के दूसरे भागों की ओर बांट दिया जाता है। या उन्हें खोला जाता है।

एक्युप्रैशर या रिफ्लैक्सोलोजी में भी एक्युपंचर की ही तरह नियम अपनाये जाते हैं। इसमें अंतर केवल इतना ही होता है कि उपचारक चाहकर या अनचाहे ही अपनी अतिरिकत प्राणशक्ति का उपयोग करता है। इस अतिरिक्त प्राणशक्तिको पहले एक्युप्रैशर केंद्र (स्थान) की ओर भेजा जाता है। बाद में जीवद्रव्य नाडिय़ों के माध्यम से पीडि़त स्था की ओर भेजा जाता है। कुछ एक्युपंचरकर्ता अनी प्राणशक्ति या ओजस्वी शक्ति को सुई के माध्यम से पीडि़त स्थान तक पहुंचाते हैं। यह उन रोगियों के लिए किया जाता है जो बहुत ही कमजोर होते हें। इस पुस्तक के लेखक ने एक एक्युपंचर डॉक्टर और एक एक्युप्रैशर डॉक्टर से भेंट की जो चीन की ताई ची पद्धति में भी माहिर थे। दोनों डॉक्टर अपनी प्राणशक्ति को रोगियों में भेजने या हस्तांतरित करने में सक्षम थे।

प्राणशक्ति उपचार से क्या किया जा सकता है ?

  1. तेज बुखार से पीडि़त अपने बच्चों का तापमान कुछ ही घंटों में कम करने और एक या दो दिन में ही पूरा लाभ दिलाने में माता-पिता की सहायता करता है।
  2. अधिकतर पीडि़तों को शीघ्र ही सिर दर्द, गैस, दांत दर्द और मांसपेशियों के दर्द से छुटकारा दिला सकता है।
  3. सामान्यत: सर्दी और खांसी एक दो दिन में ही कम हो जाती है। अधिकांश लोगों में दस्त की बीमारी कुछ ही घंटों में दूर की जा सकती है।
  4. बड़ी बीमारियां जैसे आंख, जिगर, गुर्दे और हृदय रोग से कुछ बार के उपचार से छुटकारा पाया जा सकता है और अधिकांश केसों में कुछ महीनों में इसका पूरा उपचार हो जाता है।
  5. सामान्य रूप से उपचार होने की क्षमता को यह तीन गुना अधिक बढ़ाता है।

इस प्रकार यह माना जा सकता है कि उपचारक को एक सीमा तक परिपक्वता व कुशलता प्राप्त है। ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें प्राणशक्ति उपचार द्वारा किया जा सकता है।

प्राणशक्ति उपचार सीखना आसान है

कोई भी स्वस्थ व्यक्ति जो सामान्य बौद्धिक क्षमता, ध्यान केंन्द्रित करने की सामान्य योग्यता, खुला परंतु उचित चुनाव करने वाला मन और एक सीमा तक दृढ़-प्रतिज्ञ हो, वह अपेक्षाकृत कम समय में प्राणशक्ति उपचार आसानी से सीखा जा सकता है। इसे सीखना गाड़ी चलाना सीखने के समान सरल है। कुछ ही सत्रों में इसकी मूलभुत तकनीक और नियमों को सीखा जा सकता है। गाड़ी चलाने की तरह इसमें कुशलता प्राप्त करे के लिए दैनिक अभ्यास और समय की जरूरत होती है।

Acharya Anupam Jolly

आचार्य अनुपम जौली, यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है और अब आचार्य जी ने रमल शास्त्र पर अपनी कुछ अत्यंत विशिष्ट खोज करके यह साबित कर दिया कि कालांतर में विलुप्त हो चुकी हमारी अद्भुत एवं दिव्य ज्ञानवर्धक विद्यायें हमारे लिए बेहद लाभदायक थीं। जिन्हें अल्पज्ञान के चलते आप और हम नजऱ अन्दाज कर बैठे हैं।

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