ग्रह पीड़ा निवारण हेतु रुद्राक्ष

भारतीय संस्कृति की अमूल्य एवं अद्भुत धरोहरों में से एक धरोहरों में से एक धरोहर ‘‘रूद्राक्ष’’ है। भगवान् शिवजी ने जब त्रिपुरासुर का वध किया तो देवों के विजयोल्लास में स्वयं शिवजी हंसे और आंखों से अश्रुधारा बह निकली उसके गिरने से रूद्राक्ष वृक्ष की उत्पत्ति हुई। रूद्र के अश्रु से उत्पन्न होने के कारण इसका नाम रूद्राक्ष पड़ा। रूद्राक्ष का अर्थ अर्थात् भगवान शंकर की आँख है। यह एक प्रकार का जंगली फल है। काली मिर्च से लेकर बेर के आकार तक मिलते है।

शिवपुराण, लिंग पुराण, पद्म पुराण, स्कन्द पुराण एवं उपनिषदों में तन्त्र, मन्त्र आदि ग्रन्थों में रूद्राक्ष के गुणों का वर्णन मिलता है। इसको धारण करने से आध्यात्मिक रूप से उन्नति कर सकते हैं। वहीं पर सांसारिक कष्टों से छुटकारा भी पा सकते हैं। यह सर्व प्रकार की सुख समृद्धि एवं शान्ति प्रदान करता है। इसके धारण करने से असंभव कार्य सम्भव हो जाता है। हृदय रोग एवं उच्च रक्तचाप के रोगियों के लिए वरदान है। इसके धारण करने से भूत-पे्रत बाधाएं दूर होती है।

रूद्राक्ष पर पाई जाने वाली धारियां ही मुख कहलाती है। मुख्य रूप से रूद्राक्ष के 14 मुख तक प्राप्त होते है।

एकमुखी रूद्राक्ष किसी भाग्यशाली व्यक्ति को मिलता है। दो से सात मुखी तक के रूद्राक्ष सर्व सुलभ हैं। आठ से चौदह मुखी तक प्राय: कभी – कभी मिलते हैं। 15 तथा 21 मुखी के रूद्राक्ष दुर्लभ हैं। आजकल बाजार या धर्म स्थान पर नकली रूद्राक्ष मिलते हैं जिन पर ú त्रिशूल आदि चित्र अंकित होते हैं। जिस रूद्राक्ष में धागा पिरोने के लिए प्राकृतिक रूप से छेद बना हो वह रूद्राक्ष उत्तम होता है।

रूद्राक्ष की परीक्षा विधि

  1. शुद्ध रूद्राक्ष पानी या दूध में डूब जाता है, परन्तु नकली तैरता रहता है।
  2. रूद्राक्ष को हथेली पर रखकर दोनों हाथों से रगड़ा जाए तो ‘‘ओज्म सोहज्म’’ की ध्वनि सुनाई देती है।
  3. शुद्ध रूद्राक्ष को यदि अग्नि के समीप ले जाया जाए तो वह बड़े वेग से (करंट लगने की भांति) उछल जाएगा।
  4. दो तांबे के सिक्कों के मध्य रूद्राक्ष को रखकर दबाया जाय तो वह एक झटके साथ दिशा बदल लेता है।

धारण विधि

रूद्राक्ष धारण करने का साधारण नियम है। सर्वप्रथम रूद्राक्ष की माला या दाना जो भी आप धारण करना चाहते हो। चार से सात दिनों तक सरसों के तेज में डालकर रखें। इसके पश्चात् गंगाजल, गौ, दुग्ध एवं अन्य पवित्र तीर्थ के शुद्ध जल से स्नान करा के चन्दन, धूप, दीप, अक्षत से शिवजी के समान विधिवत् पूजा करें। तत्पश्चात् दस माला

नम: शिवाय।।

का जाप करें। रूद्राक्ष को शिवलिंग से स्पर्श कराकर हवन की भभूति का तिलक लगाएं। पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके उपरोक्त लिखित मंत्र से 21 बार अभिमन्त्र करके लाल या सफेद धागे में पिरोकर गले या बाजु में पहने। भगवान् शिव (शंकर) जी को प्रणाम करें। सभी आश्रमों एवं वर्णों तथा स्त्री और शुद्रों को सदैव रूद्राक्ष धारण करना चाहिए, यह शिवजी की आज्ञा है। सभी वर्ण के लोग इसे धारण कर सकते हैं – अन्तर इतना है कि शूद्र बिना पूजा एवं मन्त्र जप के धारण कर सकते हैं परन्तु अन्य वर्ण वालों को विधिवत् पूजा करके ही धारण करना चाहिए।

विशेष सावधानी

रूद्राक्ष धारण करने पर मद्य, मांस, मछली, अण्डा, लहसुन, प्याज, सहजन, लिसोड़ा और ग्राभ्यसूकर (विड्वराह) इन पदार्थों परित्याग करें।

जिस घर में किसी शिशु का जन्म या किसी की मृत्यु हुई हो तो उस घर में जाने से पहले से उतार कर जाएँ।

रूद्राक्ष को शुभ मुहुर्त में धारण करना चाहिए

ग्रहण में, मेष, तुला, कर्क, मकर, संक्रातिं, अमावस्या, पूर्णिमा, एवं पूर्ण तिथि में धारण करने से सम्पूर्ण पापों का नाश होता है।

रूद्राक्ष धारण करने के 40 दिन के अंतर इसका प्रभाव महसूस होने लगता है।

रूद्राक्ष की माला में दानों की संख्या –

  • 100 दाने की माला मोक्ष देने वाली होती है।
  •  108 दाने की माला सभी कार्यों को सिद्धि प्रदान करती है।
  • 140 दाने की माला साहस, पराक्रम तथा स्वास्थ्य रखती है।
  • 32 दाने की माला आय की वृद्धि करती है।

रूद्राक्ष द्वारा रोग उपचार

  1. पाँच मुखी – रूद्राक्ष को उत्तराषाढ़ (सूर्य का नक्षत्र) में गुलाबी धागे में बाँधकर गले में डालने से समस्त नेत्र विकारों से निवारण होता है। डालने के पहले विधि विधान से प्राण प्रतिष्ठ करके पवित्र करें। शुभ मुहूर्त में रोगी का पूर्णलाभ देगा।
  2. रवि पुष्प योग में आँवले के बराबर पाँच मुखी रूद्राक्ष गुलाबी धागे में धारण करने से सभी प्रकार के हृदय रोगों का निदान होता है।
  3. 3 कृत्तिका नक्षत्र या रविवार को पाँच मुखी रूद्राक्ष को ताँबे के कलश में जल भरकर डालें। अगले दिन से खाली पेट इसका प्रतिदिन जल का सेवन 11 हफ्ते तक करें। इस हृदय रोगी को आराम मिलेगा।
  4. मृगशिरा नक्षत्र युक्त मंगलवार को आठ मुखी (8) रूद्राक्ष लाल धागे में दाहिनी भूजा में धारण करने से यकृत व लीवर सम्बन्धी रोगों से लाभ होता है।
  5. रूद्राक्ष की माला (108) दाने की किसी भी बुधवार को बुध की होरा में धारण करने ने रक्तचाप ठीक रहता है।
  6. छ: (6) मुखी रूद्राक्ष को हरे धागे को बुध की होरा में गले में डालने से दमा के रोगी को आराम मिलेगा।
  7. चौदहमुखी (14) रूद्राक्ष को जल में डुबोकर रखे। इस जल को रोगी को देने से जी मचलाना व चक्कर आने बंद हो जाते हैं।
  8. ग्यारह (11) मुखी रूद्राक्ष को सफेद धागे में गले में धारण से टिटेनस के रोग से आराम होता है।
  9. पुष्य नक्षत्र युक्त शनिवार अष्ट मुखी रूद्राक्ष चार-पाँच दाने जल से भरा कांसे के बर्तन में डाले। अगले दिन से निरन्तर इस जल को सेवन करते से कमर दर्द का निवारण होता है।
  10. तीन (3) मुखी रूद्राक्ष पहनने से रूक-रूक के ज्वर होने पर आराम मिलता है।
  11. चार (4) मुखी रूद्राक्ष डालने से मंद बुद्धि क्षीण स्मरण शक्ति एवं कमजोर वाक् शक्ति के यह बहुत अच्छा है।
  12. छ: (6) मुखी रूद्राक्ष ब्लड प्रैशर, हार्ड अटैक, टी.वी. दमा, खाँसी, गैस का रोग आदि दूर होता है।
  13. आठ (8) मुखी रूद्राक्ष से कोट कचहरी दुर्घटनाओं से शत्रुओं से तथा भूत-प्रेत से रक्षा करता है।
  14. दस (10) मुखी रूद्राक्ष को दूध के साथ घिसकर प्रतिदिन 2-3 बार चटाया जाये तो खाँसी का रोग शान्त होता है।
  15. छ: मुखी रूद्राक्ष से हिस्टीरिया, मुर्छा एवं प्रदक आदि स्त्रियों के रोगों में आराम मिलता है।
  16. चतुर्मुखी रूद्राक्ष को गौ के दूध में उबाले और 3-4 सप्ताह तक पीने से मानसिक रोगों में सफलता होती हैं।

Acharya Anupam Jolly

आचार्य अनुपम जौली, यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है और अब आचार्य जी ने रमल शास्त्र पर अपनी कुछ अत्यंत विशिष्ट खोज करके यह साबित कर दिया कि कालांतर में विलुप्त हो चुकी हमारी अद्भुत एवं दिव्य ज्ञानवर्धक विद्यायें हमारे लिए बेहद लाभदायक थीं। जिन्हें अल्पज्ञान के चलते आप और हम नजऱ अन्दाज कर बैठे हैं।

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