Anupam Jolly

रहस्य सिद्धि – ध्यान है प्रत्येक सफलता का राज l

रहस्य सिद्धि भाग – 3 ध्यान की उपोगिता

चमत्कारों की उपलब्धि

किसी मन्त्र या तन्त्र के जाप से या किसी विशेष विधि से भी चमत्कारों का स्वामी बना जा सकता होगा, परन्तु यहाँ हम उसका कोई भी जिक्र नहीं करेंगें। यद्यपि हाथ की सफाई और रसायनों के सम्मिश्रण के अनेक आश्चर्यजनक कारनामे अवश्य ही पूर्व जीवन में मेरे अभ्यास में आते रहे हैं। प्रस्तुत रहस्य सिद्धि श्रंखला में उस विषय की सामग्री देने की मेरी कोई रुचि नहीं है। इसमें तो गहरे जिज्ञासुओं की तृप्ति के लिए केवल ‘योग’ की सम्भावनाओं। को ही प्रस्तुत करना चाहूँगा।

जिस घ्यान की गहराई किसी साधक या तपस्वी को परमात्मा की ओर ले जाती है, उसी ध्यान को किसी सांसारिक उपलब्धि (चमत्कार) की ओर भी केन्द्रित किया जा सकता है, लेकिन इसकी एक विशेष व्यवस्था होती है।

निम्न उदाहरण से इसे समझें एक कमरा है । उसमें अनेक वस्तुएँ रखी हैं, परन्तु कमरे में घुप्प अंधेरा है। वस्तुएँ होते हुए भी दिखाई नहीं पड़तीं। अब हम एक दिया जलाकर कमरे में लायें। दिये का प्रकाश सभी वस्तुओं पर पड़ रहा है। सभी वस्तुएं समान रूप से आलोकित हो उठी हैं। दिये की रोशनी चारों तरफ फैल गई है। रोशनी किसी एक दिशा में नहीं फैली, बस फैली है चारों ओर । दिये को कोई मोह नहीं है कि यहाँ रोशनी यहाँ दे अथवा वहाँ रोशनी दे । दिये की रोशनी अकेन्द्रित (Unfocussed) है। अब यदि आपको कोई विशेष वस्तु ही कमरे से उठानी है, तो इस दिये का उपयोग आपको टार्च (Torch) की तरह करना होगा। टार्च यदि बायीं ओर प्रकाश फेंक रहा हो तो बाकी सब ओर अंधेरा रहेगा, इसलिये बायीं ओर की वस्तु विशेष रूप से आलोकित हो उठेगी। आप अपनी इच्छित वस्तु को टार्च के केन्द्रित (Focussed) प्रकाश में स्पष्ट रूप से देख सकेंगे; क्योंकि फोकस्ड प्रकाश में तीक्ष्णता होती है। इसमें सारी रोशनी बँधकर एक ओर ही प्रवाहित होती है।

ध्यान का भी एक फोकस है। यदि किसी निश्चित दिशा में प्रवाहित करना हो तो ध्यान का प्रयोग भी टार्च की तरह करना होता है। जीवन के सीधे सत्य को जानने के इच्छुक, ध्यान को दिये के रूप में ही विकसित करते हैं । वे किसी भी आग्रह से, किसी भी सम्मोहन से मुक्त होते हैं ।

ध्यान को उसकी पूरी समग्रता में एक ही ओर केन्द्रित कर देने से इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो जाती है।

 हमें अपनी बुद्धि को वैज्ञानिक बनाना चाहिये!

योग के साधक में वैज्ञानिक बुद्धि होनी चाहिये, तभी वह परिस्थितियों पर विजयी हो सकेगा। साधक के मार्ग में अनेक जटिल परिस्थितियाँ उत्पन्न होती रहती हैं। देश और काल के अनुसार मान्यताएँ बदलती रहती हैं। वैज्ञानिक बुद्धि वह कहलाती है, जो हमेशा (Hasitate) संकोच करती है । वैज्ञानिक बुद्धि का आदमी बहुत जल्दी निर्णय नहीं लेता कि यह गलत है या वह सही है। वह हमेशा यह कहता है-शायद यह सही भी हो सकता है, मैं और खोजूं, और प्रयोग करूं। वह अन्तिम क्षण तक भी निर्णय नहीं लेता, वह कभी (Finally) पूर्ण रूप से यह नहीं कहता कि यह गलत है, इसे तोड़ दो, इसे नष्ट कर दो; क्योंकि जीवन इतना रहस्यपूर्ण है कि कुछ भी नहीं कहा जा सकता। हम इतना ही कह सकते हैं का हम अभी इतने तक ही जानते हैं, उसकी वजह से यह हमें भी गलत मालूम पड़ता है।

वैज्ञानिक बुद्धि का आदमी यह कहेगा कि अब तक की जो जानकारी है, उसको देखते हुए यह बात ठीक मालूम नहीं पड़ती है। लेकिन जानकारी कल बढ़ जाये तो यह ठीक भी हो सकती है । जो आज ठीक है, वही कल गलत भी हो सकता है। वैज्ञानिक आदमी हमेशा जिज्ञासुविनम्रधैर्यशील और खोज में संलग्न होता है।

क्रमशः ……….

Acharya Anupam Jolly

आचार्य अनुपम जौली, यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है और अब आचार्य जी ने रमल शास्त्र पर अपनी कुछ अत्यंत विशिष्ट खोज करके यह साबित कर दिया कि कालांतर में विलुप्त हो चुकी हमारी अद्भुत एवं दिव्य ज्ञानवर्धक विद्यायें हमारे लिए बेहद लाभदायक थीं। जिन्हें अल्पज्ञान के चलते आप और हम नजऱ अन्दाज कर बैठे हैं।

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