वैदिक वास्तु शास्त्र : किस दिशा में क्या निर्माण करें

वास्तु शास्त्र में सौलह दिशाओं का विधान है l चार दिशाए उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम l चार कोण आग्नेय, नैऋत्य, ईशान और वायव्य l बाकि इन आठों दिशाओं के मध्य बनने वाली आठ दिशाए l इस प्रकार भवन में 16 विभिन्न प्रकार की उर्जाए होती कई जिसका उपयोग कर हम सुख शांति व समृद्धि को प्राप्त करते है l आइये जानते है की वास्तु ग्रंथों में इन सौलह दिशाओं के संधर्भ में निर्माण कार्यों के क्या संकेत दिए गए है l

स्नानस्य पाकशयनास्त्रभुजेश्च धान्य, भाण्डारदैवतगृहाणि च पूर्वत: स्यु:।

तन्मध्यतोऽथ मथनाज्यपुरीषविद्या, भ्यासाख्यरोदनरतौषधसर्वधाम।।

श्लोक के अनुसार भवन के पूर्व दिशा में स्नान का गृह (Bath Room), अग्नि कोण (South-East) में पाक का गृह (Kitchen), दक्षिण दिशा में शयन का स्थान (Bed Room), नैऋत्य कोण में हथियारों का कमरा (Weapons), पश्चिम दिशा में भोजन करने का स्थान (Dining Room), वायव्यकोण में धान्य (अन्न) रखने का गृह (Wheat, Grain, Storage), उत्तर दिशा में भाण्डार गृह (Safe, The vault, Money, Jewellery etc.) और ईशान कोण में देवता का गृह (Temple) बनाना उत्तम होता है।

इसके अलावा पूर्व ओर अग्नि कोण के बीच में मथन (दही मथने) का (mixer, grinder), अग्नि कोण और दक्षिण के बीच में घी रखने का (Ghee, Oil, Spices Storage), दक्षिण और नैऋत्य के बीच में पुरीष (पाखाना) का (Toilet), नैऋत्य और पश्चिम के बीच विद्याभ्यास (पढऩे) का (Study Room), पश्चिम और वायव्य के बीच में रोदन का (Crying Room, Mental distress room), वायव्य और उत्तर के बीच में रत (मैथुन) का (Bed Room, newly married couple room), उत्तर और ईशान के बीच में औषध का घर (Medicine and Yoga Room) और ईशान तथा पूर्व के बीच में सर्वधाम (Room for all kinds of work) बनाना चाहिये।।

विशेष नोट : प्रथम अर्घ का अर्थ पूर्ववत् है किन्तु ‘नैऋत्य में वस्त्र का (Clothing wardrobe), वायव्य में पशु का घर (Cattle ranch) बनाने में इन दिशाओं का उपयोग आप कर सकते है।

स्नानाग्निस्वपिवस्त्रभोजनपशुद्रव्यामरौकस्थितिं, पूर्वादौ जलमीशितुर्दिशि परं वायोरपाङ्मूत्रकम्।

आल्पे शक्तिभुवो यथारूचि परे गेहस्य दक्षे घर, ट्टाम्बूलूखलचुल्लिकापितृपदप्रक्षालनान्यूचिरे।।

इसी प्रकार जल का स्थान ईशान में (Underground Water Tank), मूत्र पुरीषोत्सर्ग का स्थान वायु कोण (Toilet) में बनाना चाहिये। यदि जगह की कमी हो तो यथा रुचि (जहाँ जिस वस्तु की सुविधा हो वहाँ वह वस्तु रखने का स्थान) बनाना चाहिये। और घर के दक्षिण भाग में जाता, ओखली मूसल, चुह्लिका, पितृपद प्रक्षालन (Mortar, Pestle, Ancestral) आदि का स्थान बनवाना चाहिये ।।

Acharya Anupam Jolly

आचार्य अनुपम जौली, यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है और अब आचार्य जी ने रमल शास्त्र पर अपनी कुछ अत्यंत विशिष्ट खोज करके यह साबित कर दिया कि कालांतर में विलुप्त हो चुकी हमारी अद्भुत एवं दिव्य ज्ञानवर्धक विद्यायें हमारे लिए बेहद लाभदायक थीं। जिन्हें अल्पज्ञान के चलते आप और हम नजऱ अन्दाज कर बैठे हैं।

Add comment

Follow us

Don't be shy, get in touch. We love meeting interesting people and making new friends.

error: Content is protected !!